Mentle Health is so important. For this Margadarshi Dhyaan Chakra is useful too much
मार्गदर्शी ध्यान चक्र
| मार्गदर्शी ध्यान चक्र | ||
|---|---|---|
| लाल रंग का धरातल प्रतीक है - | 'भव' (संसार / ब्रह्मण्ड) का | |
| नीला रंग का घेरा प्रतीक है - | बुद्ध की दिव्य शिक्षाओं का यथा- 'ब्रह्म-विहार' (मैत्री, करूणा, मुदिता, उपेक्षा) | |
| पीला रंग की चार घुण्डी प्रतीक है - | 'चार आर्य सत्य' का (दुख, कारण, निवारण, मार्ग) | |
| नारंगी रंग की आठ तीलियाँ प्रतीक है - | 'अष्टांगिक मार्ग' (सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् अजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि) | |
| लसफेद रंग का वृत्त प्रतीक है - | 'निर्वाण' का | |
| 'मध्यम मार्ग' | मार्गदर्शी चक्र की सभी तीलियों के 90 अंश के मध्य में स्थित तीली 'अतिसर्वत्र वर्जयेत्' का प्रतीक है। | |
| मार्गदर्शी ध्यान चक्र में प्रयुक्त रंगों का विवरण | ||
|---|---|---|
| पंचशील | प्रतीक | संकेत |
| सत्य | लाल रंग | गतिशीलता एवं दृढ़ संकल्प (The Blessings that the practice of the Buddha's Teaching brings) |
| अहिंसा | नीला रंग | समानता एवं व्यापकता (Universal Compassion) |
| अस्तेय | पीला रंग | मध्यम-मार्ग एवं करूणा (The Middle way which avoids all extremes and brings Balance and Loving Kindness) |
| अपरिग्रह | नारंगी रंग | त्याग एवं सेवा (The unshakable Wisdom of Buddha's Teaching) |
| ब्रह्मचर्य | सफेद रंग | शुद्धता एवं शान्ति (The Purity of The Buddha's Teaching and Liberation) |
'ब्रह्म-विहार'
मैत्री – दूसरों के हित की साधना करना मैत्री है। (विश्व बन्धुत्व की भावना की उत्पत्ति मैत्री से होती है।)
करूणा – दूसरों के पीड़ा का अनुभव करना करूणा है। (असीम दया और क्षमा करने की क्षमता करूणा से उत्पन्न होती है।)
मुदिता – दूसरों के सुख से सुखी होना मुदिता है। (ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध इत्यादि मानवोचित अवगुण मुदिता से दूर होते हैं।)
उपेक्षा – दूसरों के प्रति समभाव रखना उपेक्षा है। (भेद-भाव की उपेक्षा कर आसक्ति रहित उदासीन भाव रखना चाहिए।)
चार आर्य सत्य'
दुःख – संसार दुःखमय है। सुख के नष्ट होने का भय भी दुःख ही है।
कारण – दुःखों की उत्पत्ति का कारण अवश्य होता है।
निवारण – दुःखों के प्रत्येक कारण का निवारण अवश्य होता है।
मार्ग – दुःखों के प्रत्येक कारण के निवारण का मार्ग अवश्य होता है।
'अष्टांगिक मार्ग '
दुःखों की उत्पत्ति के अनेक कारणों में से मूल कारण है तृष्णा (सांसरिक मोह बन्धन)। तृष्णा का जन्म अविद्या (अज्ञान) से होता है। दुःख के कारणों के नाश के आठ मार्ग हैं
सम्यक् दृष्टि – सम्यक् दृष्टि यथार्थ दृष्टि है। अविद्या के कारण भ्रम अथवा मिथ्या दृष्टि उत्पन्न होती है। शिक्षा से ही व्यक्ति चार आर्य सत्यों को पहचान सकेगा तथा सही (सम्यक) और वास्तविक रूप में विषय-वस्तु को समझ पायेगा। सम्यक् दृष्टि से तात्पर्य है व्यक्ति को दृष्टिकोण सदैव ठीक रखना चाहिए।
सम्यक् संकल्प – विचार ही हैं जो प्राणी को पवित्र या अपवित्र बना सकते हैं। सद्विचारों में दृढ़ता का होना सम्यक् संकल्प है।
सम्यक् वाक् – अनुचित वचन का त्याग तथा संयमित वाणी सम्यक् वाक है। यह सम्यक् संकल्प का ही बाह्य रूप है। बैर से बैर का शमन नहीं होता किन्तु प्रीति से होता है। मन को शान्त करने वाला एक हितकारी शब्द हजार निरर्थक शब्दों से अच्छा है।
सम्यक् कर्मान्त – सद्धर्मो को अपनाते हुए पाप कर्मों का त्याग ही सम्यक् कर्मान्त है। वे कर्म ठीक कहे जाते हैं जिन्हें करने से न आपको और न किसी दूसरे को कष्ट हो।
सम्यक् अजीव – शुद्ध उपायों से जीविकोपार्जन करना सम्यक् अजीव है। जीवन निर्वाह के लिए ईमानदारी के साथ उचित व विधि सम्मत मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।
सम्यक् व्यायाम – मन-मस्तिष्क में कुसंस्कारों व अशुभ विचारों को रोकने तथा सद्विचारों को ग्रहण करने का प्रयास ही सम्यक् व्यायाम है। यह मानसिक व्यायाम है।
सम्यक् स्मृति – ज्ञान विषयों को यथार्थ रूप में पुनः पुनः याद करना सम्यक् स्मृति है। यर्थाथ रूप को भूल जाने से मिथ्या विचार जड़ पकड़ लेते हैं एवं तृष्णा की उत्पत्ति होती है तथा उसके अनुसार कियांयें होने लगती है। तृष्णा (सांसरिक मोह बन्धन) ही आसक्ति (अति अनुराग/प्रेम) का कारण है। आसक्ति ही समस्त दुख व वियोग से मानव को घेरे हुए है।
सम्यक् समाधि – चित्त की एकाग्रता द्वारा निर्विकल्प ज्ञान की अनुभुति सम्यक् समाधि है। यह ‘अष्टांगिक मार्ग के सात नियमों का सम्यक् अनुपालन करने से प्राप्त होने वाली वह अवस्था है जिसमें चित्त निर्मल व शान्त हो जाता है। ‘निर्वाण’
'निर्वाण'
' मध्यम-मार्ग '
मार्गदर्शी योग
आठ मिनट अट्ठारह योग अनगिनत लाभ
मार्गदर्शी योग के चरण
(1) ) सुखासन / वज्रासन
(2) ज्ञान मुद्रा
(3) ) धमनी शोधन योग (समाविष्ट – बाह्य प्रायाणाम)
(4) स्कंधयोग
(5) भस्त्र योग (समाविष्ट – पश्च, उच्च, अग्र डायाफ्राम ब्रीथिंग भस्त्रिका प्रायाणाम)
(6) ग्रीवा संचालन
(7) काकी मुद्रा
(8) विवर योग (समाविष्ट – माण्डुकी मुद्रा)
(9) खेचरी मुद्रा
(10) नेत्रासन (समाविष्ट – त्राटक मुद्रा)
(11) नेत्र मर्म (एक्यूप्रेशर)
(12) आज्ञा चक्र मुद्रा
(13) पराग मुद्रा
(14) गुंज योग (समाविष्ट – भ्रामरी प्रायाणाम एवं उज्जायी प्रायाणाम)
(15) एकाग्रासन
(16) तालासन
(17) हथेली मर्म (समाविष्ट आदि मुद्रा)
(18) नमो मार्गदर्शी (समाविष्ट – अंजलि मुद्रा)
(1) सुखासन / वज्रासन
(2) ज्ञान मुद्रा
(3) धमनी शोधन योग
(4) स्कंधयोग
(5) भस्त्र योग
मुट्ठी बाँध लें। उगलियों खोलते और गहरी सॉस लेते हुए हाथों को सामने की ओर ले जायें, फिर सांस छोड़ते और मुट्ठी बंद करते हुए सीने के पास लायें, आठ (8) बार।
पश्च भस्त्र योग
मुट्ठी बॉध लें। उगलियाँ खोलते और गहरी सॉस लेते हुए हाथों को कान के पीछे की ओर ले जायें, फिर सांस छोड़ते और मुट्ठी बंद करते हुए सीने के पास लायें, आठ (8) बार।
उच्चभस्त्र योग
मुट्ठी बॉध लें। उगलियाँ खोलते
और गहरी साँस लेते हुए हाथों को ऊपर की ओर ले जायें, फिर सांस छोड़ते और मुट्ठी बंद करते हुए सीने के पास लायें, आठ (8) बार।
सावधानी :- सांस का लेना और छोड़ना सामान रखें। सांसों पर ध्यान लगाइए जब तक की सांसे सामान्य ना हो जाए यही वह समय है जब आपको योग ऊर्जा प्राप्त होती है। किसी आराम अवस्था में बैठे लेकिन ध्यान रहे आपकी शरीर, गर्दन और सिर सीधा हो। जिस तरह लोहार की धौंकनी लगातार फुलती और पिचकती रहती है, उसी तरह दोनों नासिकाओं से धीरे-धीरे वायु अंदर लीजिए और पेट को फैलाइए, उसके बाद गर्जना के साथ इसे तेजी से बाहर फेंकिए। सांस लेते समय न फेफड़ा फूलना चाहिए ना पेट। योग के समय शरीर को बिल्कुल ना हिलाएं।
(6) ग्रीवा संचालन
(7) काकी मुद्रा
(8) विवर योग
(9) खेचरी मुद्रा
(10) नेत्रासन
बाएं हथेली से बाएं नेत्र को ढक लें फिर दाएं हाथ को सामने की ओर फैलाकर गर्दन को सीधा रखते हुए मुट्ठी बॉधकर दाएं अंगूठा या अंगूठे का नाखून को आंखों से देखते हुए दाएं हाथ को गहरी सांस भरते हुए उतनी दूर तक धीरे-धीरे ले जाएं जहां तक की दृष्टि को उतना दूर तक ले जाएं जहाँ तक अंगूठा या अंगूठे का नाखून स्पष्ट रूप से दिखाई दे फिर सांस को धीरे-धीरे छोड़ते हुए हाथ को पुनः नाक की सीध में लाना है। यह प्रक्रिया चार (4) बार करें।
फिर उक्त नेत्रासन को उक्त प्रकार से दाएं तरफ चार (4) बार दोहराना है।
फिर उक्त नेत्रासन को दाएं हाथ से नाक की सीध में जितना नजदीक ला सकते हैं उतना तीन बार लाना है, यथासम्भव रूक कर वापस ले जाना है।
इसके बाद नाक के सिरे पर दृष्टि टिकाकर आँखों को बड़ा खोलकर चक्राकार संचालन चार (4) बार करें।
पलकों को अट्ठारह (18) बार झपकाकर आखों को हथेली से ढकें।
(11) नेत्र मर्म (एक्युप्रेशर)
(12) आज्ञा चक्र मुद्रा
(13) पराग मुद्रा
(14) गुंज योग
पराग मुद्रा लगाकर कंठ से नाक के माध्यम से धीरे-धीरे लंबी, गहरी सांस, कंठ को सिकोड़कर इस प्रकार लें कि गले से खर्राटें की आवाज उसी प्रकार की हो जैसे कबूतर गुटुर-गूं करते हैं।
कुछ क्षण के लिए रूके और धीरे-धीरे नाक के माध्यम से ही मधु-मक्खी जैसी आवाज (हमिंग साउण्ड) आवाज के साथ सांस को छोड़े। सांस छोड़ते समय चेहरे के विभिन्न हिस्सों में कंपन होना चाहिए, मुख्यरूप से जहाँ उंगलियों को रखा है। चित्त/ मन को दोनों आंखों के बीच आज्ञा चक्र पर करें। चार (4) बार श्वास इसी प्रकार लें और छोड़ें।
(15) एकाग्रासन
(16) तालासन
तैलीय हथेली युक्त हाथेली से ताली बजाते समय, उंगली पर उंगली एवं हथेली पर हथेली टकराये। यहाँ एकाग्रता पर विशेष ध्यान देना है।
अग्र तालासन गहरी साँस लेते हुए हाथों को जितना पीछे ले जा सकते हैं, ले जाएं फिर हाथों को आगे लाकर ताली बजायें, आठ (8) बार।
पश्च तालासन गहरी सॉस लेते हुए हाथों को पीठ के पीछे की ओर ले जायें और ताली बजाये, फिर सांस छोड़ते हाथों को पेट के आगे की ओर लायें और ताली बजाये, आठ (8) बार।
उच्च तालासन गहरी साँस लेते हुए हाथों को ऊपर की ओर ले जायें और ताली बजाये, फिर सांस छोड़ते हाथों नीचे की ओर लायें, आठ (8) बार।
(17) हथेली मर्म
सर्वप्रथम बाएं हाथ के अंगूठे को अंदर की ओर रखते हुए बाकी चारों उंगलियों को अंदर की ओर मुट्ठी बाँधने की स्थिति में मोड़ लीजिए। दाएं हाथ की हथेली पर आठ (8) बार यथासम्भव तीव्र चोट जल्दी-जल्दी मारें। फिर उक्त प्रकार की क्रिया, दाएं तरफ आठ (8) बार दोहराना है। फिर दाएं या बाएं हथेली में से किसी एक गड्ढे में दूसरे हाथ की अनामिका उंगली से चार बार चोट मारें, क्रमशः अन्य उंगलियों को बारी-बारी से साथ लेकर उनके द्वारा भी ऐसा ही करें।
फिर उंगलियों को (पंजा) खोलकर आठ (8) बार ताली बजाएं।
फिर जैसे ही ताली खत्म हो, तुरन्त हथेली को आठ (8) बार रगड़े। फिर मध्यमा उंगली को आंखों पर रखकर गहरी सांस लें और शेष उंगलियों एवं हथेली की गर्माहट से चेहरे को उर्जावान बनाएं।
(18) नमो मार्गदर्शी
दोनों हाथों को कोहनी से मोड़कर एक दूसरे के पास लायें। दोनों हथेलियों को हृदय चक्र (यह अनाहत चक्र प्यार और सर्मपण से जुड़ा है) के सामने एक साथ लाएं। फिर दोनों हाथों को एक दूसरे से स्पर्श कराएं जिससे हथेली और उंगलियों पूरी तरह से एक दूसरे को स्पर्श करें। हाथों को समान रूप से और मजबूती से दबाने की जरूरत है।
फिर धीरे से हाथों को नीचे सीने के पास ले जायें। सिर को थोड़ा नीचे झुकाएं और नमो मार्गदर्शी का सम्बोधन करते हुए सामान्य स्थिति में आ जायें।