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Margadarshi Buddha Vihar Provides teachings of Margadarshi Darshan etc.
मार्गदर्शी दर्शन
पूर्ण इच्छायें
सुख =———-
कुल इच्छायें
Fulfill Desires
Happiness =——-
Total Desires
उपरोक्त पाँच सिद्धान्त जीवन को सफल बनाने का सार हैं। इनसे जीवन में समभाव उत्पन्न होता है जिससे न केवल लालसा, आवेश, भ्रान्ति जैसे मानसिक दुर्गुणों पर नियंत्रण प्राप्त होता है बल्कि शारीरिक क्षमता में होने वाला विकास जीवन-मार्ग को सरल करता है।
उपरोक्त पाँच सिद्धान्त की संक्षिप्त व्याख्या निम्नवत् है
(1) इच्छायें पूर्ण होने की सीमा होती है, इच्छायें करने की नहीं। इसलिए यदि इच्छाओं को क्षमतानुसार सीमित रखा जाए तो जीवन में सुख की अधिकता को महसूस किया जा सकता है अन्यथा जीवन सदैव दुखमय लगेगा।
(2) अतीत में हो चुकी घटनाओं से सबक तो अवश्य लिया जा सकता है परन्तु अतीत की घटनाओं को बदला नहीं जा सकता, ठीक इसी प्रकार आगामी समय को सवॉरने का प्रयास वर्तमान में ही क्या जा सकता है भविष्य का तनाव लेने से नहीं। अतः भूत और भविष्य के तनावों को न्यूनतम किया जा सकता है जिससे कुल तनावों में जबरदस्त कमी आयेगी। वेवजह के तनावों से बचने पर जीवन सुखमय बनेगा।
(3) सूचनाओं के अथाह सागर में से केवल उन्हीं सूचनाओं का सेवन करें जो वस्तुनिष्ठता और वैज्ञानिकता की कसौटी पर कसी गई प्रतीत हो क्योंकि गलत सूचनाओं के सेवन से स्वंय की ही नहीं अन्य अनेकों जिन्दगियाँ बर्बाद हो सकती हैं।
(4) विपश्यना का अर्थ है जो जैसा है, उसे ठीक वैसा ही देखना-समझना है। विपश्यना आत्म-निरीक्षण द्वारा आत्म-शुद्धि की अत्यंत पुरातन साधना विधि है। गौतम बुद्ध ने इस पद्धति को जीवन जीने की कला, के रूप में सर्वसुलभ बनाया। विपश्यना का उद्देश्य विकारों का संपूर्ण निर्मूलन एवं परम्विमुक्ति की अवस्था को प्राप्त करना है। इस साधना का उद्देश्य केवल शारीरिक रोगों को नहीं बल्कि मानव मात्र के सभी दुखों को दूर करना है। गौतम बुद्ध ने विपश्यना का अभ्यास स्वंय किया और लोगों को करवाया। बुद्ध के समय में बड़ी संख्या में उत्तरी भारत के लोग विपश्यना के अभ्यास से अपने-अपने दुखों से मुक्त हुए और जीवन के सभी क्षेत्रों में उँची उपलब्धियां कर पाए।
विपश्यना अंतर्मन की गहराइयों तक जाकर आत्म-निरीक्षण द्वारा आत्म-शुद्धि की साधना है। अपने नैसर्गिक श्वास के निरीक्षण से आरंभकरके अपने ही शरीर और चित्त-धारा पर पल-पल होने वाली परिवर्तनशील घटनाओं को तटस्थ भाव से निरीक्षण करते हुए चित्त-विशोधन का अभ्यास हमें सुख-शांति का जीवन जीने में मद्द करता है। हम अपने भीतर शांति और सामंजस्य का अनुभव कर सकते हैं। हमारे विचार, विकार, भावनाएं, संवेदनाएं जिन वैज्ञानिक नियमों के अनुसार चलते हैं, वे स्पष्ट होते हैं। अपने प्रत्यक्ष अनुभव से हम जानते हैं कि कैसे विकार बनते हैं, कैसे बंधन बंधते हैं और कैसे इनसे छुटकारा पाया जा सकता है। हम सजग, सचेत, संयमित एवं शांतिपूर्ण बनते हैं। यह साधना मन का व्यायाम है।
जैसे योग और व्यायाम से शरीर को स्वस्थ बनाया जाता है वैसे ही विपश्यना से मन को। अपने ही शरीर और चित्त को तटस्थ भाव से निरीक्षण करते हुए चित्त-विशोधन और सद्गुण-वर्धन का यह अभ्यास (Dhamma), साधक को किसी सांप्रदायिक आलंबन से बँधने नहीं देता। इसीलिए यह साधना सर्वग्राहय है, बिना किसी भेदभाव के सबके लिए समानरूप से कल्याणकारिणी है।
(5) मार्गदर्शी ध्यान चक्र का प्रमुख सार है मध्यम मार्ग। जीवन में आने वाली समस्त समस्याओं के निवारण का मार्ग अवश्य है। कोई भी समस्या बिना समाधान के उत्पन्न नहीं होती। समस्या का समाधान मुख्यतः उसकी जड़ों में ही होता है। पूरा जीवन चुनौतियों को सुलझाते हुए ही बीतता है जिसमें अधिकतम सफलता वही प्राप्त करता है जो मध्यम मार्ग का अधिकतम प्रयोग करता है। अधिक अडिग रहने वाले अधिक टूटते हैं।